कभी-कभी, सबसे ऊँची तालियाँ एक कलाकार के लिए सबसे अकेला शोर बन जाती हैं। यह एक रचनाकार के जीवन की एक अजीब विडंबना है: हम अपने गहरे जख्मों को शब्दों का रूप देकर दुनिया के सामने रखते हैं, और दुनिया उन शब्दों की खूबसूरती का जश्न तो मनाती है, पर वह दर्द जिसने उन्हें जन्म दिया, महफ़िल के लिए अक्सर एक अजनबी ही रह जाता है। हम महफ़िल तो जीत लेते हैं, पर उस “वाह-वाही” की गूँज में, कहीं न कहीं खुद को ही खो देते हैं।

अनजानोंकी महफ़िल जो जमी,
दीवाने की तो असलियत ही खोई।
खूब वाह-वाही लुटाई अजनबियोंने जो
उतर ही जाने लगा नशा दीवाने का तो।
ख़त्म होते लुत्फ़ में दीवाने ने ये जाना,
के अपने दर्द और अनजानों के दिल
दोनो में के मिट नही रहे फासले।
के लफ़्ज़ तो लुटा रहे वाह-वाही,
नहीं अपनाया एहसास-ए-दर्द दिलोंने।
फिर कोशिश तो बहुत की
आलम-ए-नशे ने दीवाने पर चढ़ बोलने की,
कि लुत्फ़ तो लिया दीवाने ने,
मगर इसी एहसास में कि—
पहचान उसकी है खोई।

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